मंदिरों के झंडे हमेशा त्रिकोण ही क्यों होते हैं? आस्था या विज्ञान—जानिए इसके पीछे का रहस्यमयी सच
भारत की धार्मिक परंपराओं में मंदिरों पर लहराता त्रिकोणाकार झंडा सिर्फ आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि विज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनोखा संगम भी है। सदियों से देशभर के मंदिरों में चौकोर या गोल झंडे के बजाय त्रिकोण ध्वज ही फहराया जाता है, और इसके पीछे कई रोचक मान्यताएं जुड़ी हैं।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, त्रिकोण आकार ‘त्रिदेव’—ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा ‘त्रिगुण’—सत्व, रज, तम का प्रतीक है। यह आकार ब्रह्मांड की तीन मूल शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है, जो सृष्टि निर्माण से लेकर संतुलन तक की प्रक्रिया को दर्शाते हैं। इसलिए मंदिरों पर त्रिकोण ध्वज को शुभ और ऊर्जा-वर्धक माना जाता है।
विज्ञान के मुताबिक, हवा में लहराता त्रिकोण झंडा वायुदाब और ऊर्जा प्रवाह को सबसे अच्छी तरह काटता है। इसका आकार हवा को तीन दिशाओं में संतुलित रूप से विभाजित करता है, जिससे झंडा ऊँचाई पर अधिक स्थिर रहता है और दूर से भी साफ दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि त्रिकोण ध्वज आकाशीय ऊर्जा को आकर्षित कर मंदिर परिसर में सकारात्मक तरंगें बढ़ाता है।
धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक कारणों के इस संगम ने त्रिकोण झंडे को मंदिरों की संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। यही वजह है कि चाहे हिमालय के मंदिर हों या दक्षिण के प्राचीन धाम—मंदिरों पर सदियों से त्रिकोण ध्वज ही फहराया जाता है।