बिहार में सत्ता का ‘रिवर्स मोड’ खेल! सीएम भाजपा का तय, अब गृह विभाग पर टिकी सबकी नजर
बिहार की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों और रणनीतिक चालों के दौर से गुजर रही है। नई एनडीए सरकार के गठन के बाद अब सबसे बड़ी चर्चा विभागों के बंटवारे को लेकर हो रही है। खासकर इस बार “रिवर्स मोड” की रणनीति ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यह रणनीति सिर्फ विभागों के आवंटन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन और भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री पद भाजपा के पास जाने की स्थिति लगभग तय मानी जा रही है। ऐसे में अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि कौन-कौन से महत्वपूर्ण विभाग भाजपा अपने पास रखेगी और कौन से सहयोगी दलों को दिए जाएंगे। सामान्यतः सत्ता में प्रमुख दल अपने पास गृह, वित्त और कार्मिक जैसे अहम विभाग रखता है, लेकिन इस बार ‘रिवर्स मोड’ की चर्चा ने इस परंपरा को चुनौती दी है।
“रिवर्स मोड” का मतलब यह है कि जो विभाग पहले सहयोगी दलों के पास होते थे, उन्हें इस बार भाजपा अपने पास रख सकती है, जबकि कुछ महत्वपूर्ण विभाग सहयोगियों को देकर उन्हें संतुष्ट करने की रणनीति अपनाई जा सकती है। इस रणनीति के पीछे मकसद साफ है—गठबंधन में संतुलन बनाए रखना और भविष्य के राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करना।
सबसे ज्यादा चर्चा गृह विभाग को लेकर हो रही है। यह विभाग राज्य की कानून-व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा होता है, इसलिए इसे सबसे प्रभावशाली विभाग माना जाता है। आमतौर पर मुख्यमंत्री के पास ही गृह विभाग रहता है, लेकिन इस बार यह सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा इस परंपरा को बरकरार रखेगी या फिर कोई नया प्रयोग करेगी।
अगर भाजपा मुख्यमंत्री के साथ-साथ गृह विभाग भी अपने पास रखती है, तो इससे प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह उसके हाथ में आ जाएगा। वहीं, अगर यह विभाग किसी सहयोगी दल को दिया जाता है, तो यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा कि भाजपा गठबंधन में संतुलन और विश्वास को प्राथमिकता दे रही है।
वित्त विभाग को लेकर भी मंथन जारी है। राज्य की आर्थिक नीतियों और बजट पर नियंत्रण रखने वाला यह विभाग भी बेहद अहम माना जाता है। माना जा रहा है कि भाजपा इसे अपने पास रखना चाहेगी ताकि विकास योजनाओं और खर्चों पर सीधा नियंत्रण बना रहे। हालांकि, सहयोगी दलों को संतुष्ट करने के लिए इस विभाग पर भी समझौता संभव है।
इसके अलावा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क निर्माण और ग्रामीण विकास जैसे विभागों को लेकर भी गहन चर्चा चल रही है। ये विभाग सीधे जनता से जुड़े होते हैं और इनके जरिए सरकार अपनी छवि मजबूत करती है। इसलिए हर दल चाहता है कि उसे ऐसा विभाग मिले, जिससे वह अपने क्षेत्र में काम दिखा सके और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सके।
गठबंधन की राजनीति में विभागों का बंटवारा सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता, बल्कि यह एक राजनीतिक संदेश भी होता है। कौन सा दल कितना प्रभावशाली है, किसकी कितनी हिस्सेदारी है, और भविष्य में किसकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी—इन सबका संकेत विभागों के आवंटन से मिलता है।
इस बार भाजपा की रणनीति काफी सोच-समझकर बनाई जा रही है। पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि न सिर्फ वर्तमान सरकार मजबूत रहे, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए भी मजबूत आधार तैयार हो। इसलिए विभागों के बंटवारे में जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
वहीं, सहयोगी दल भी अपनी ताकत के हिसाब से अहम विभागों की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि उन्हें ऐसे मंत्रालय मिलें, जिनके जरिए वे अपने वोट बैंक को मजबूत कर सकें और सरकार में अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभा सकें। यही वजह है कि बातचीत का दौर लंबा खिंचता नजर आ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि “रिवर्स मोड” की यह रणनीति अगर सफल होती है, तो यह बिहार की राजनीति में एक नया ट्रेंड सेट कर सकती है। इससे गठबंधन की राजनीति में नई सोच और लचीलापन देखने को मिलेगा।
फिलहाल, बिहार की राजनीति में विभागों के बंटवारे को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आखिर किसे गृह विभाग मिलेगा और कौन से दल को कौन सा मंत्रालय सौंपा जाएगा। यह फैसला न सिर्फ वर्तमान सरकार की दिशा तय करेगा, बल्कि आने वाले समय में बिहार की राजनीति की तस्वीर भी बदल सकता है।
स्पष्ट है कि बिहार में सत्ता का यह “रिवर्स मोड” खेल सिर्फ विभागों का बंटवारा नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जो आने वाले समय में कई नए समीकरणों को जन्म दे सकता है।