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लोकतंत्र की कसौटी पर संसद: 9 मार्च को लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की आहट

संसद के मौजूदा सत्र में सियासी तापमान चरम पर पहुंचता दिख रहा है। 9 मार्च को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की संभावना ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं चल रही, जबकि सत्तापक्ष इसे महज राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बता रहा है। इस टकराव ने संसद की भूमिका, स्पीकर की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर नई बहस छेड़ दी है।

विपक्ष का कहना है कि हाल के महीनों में सदन में विपक्षी आवाजों को पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। बार-बार स्थगन, प्रश्नकाल में कटौती और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचने के आरोप लगाए जा रहे हैं। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि स्पीकर का दायित्व केवल कार्यवाही संचालित करना नहीं, बल्कि सभी पक्षों को समान अवसर देना भी है। उनका दावा है कि अगर सदन में असंतुलन बना रहता है, तो अविश्वास प्रस्ताव लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत एक वैध कदम है।

दूसरी ओर, सत्तापक्ष ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि स्पीकर संविधान के अनुसार निष्पक्ष भूमिका निभा रहे हैं और विपक्ष जानबूझकर व्यवधान पैदा कर संसद को पंगु करने की रणनीति अपना रहा है। उनके मुताबिक, अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा महज सुर्खियां बटोरने और सरकार पर दबाव बनाने का तरीका है, जिसका उद्देश्य वास्तविक संसदीय कामकाज से ध्यान भटकाना है।

संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव एक असाधारण राजनीतिक कदम होता है और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। स्पीकर को “सदन का संरक्षक” माना जाता है, जिसकी निष्पक्षता पर पूरे संसदीय तंत्र की विश्वसनीयता टिकी होती है। ऐसे में इस तरह की पहल संसद की गरिमा पर असर डाल सकती है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि लोकतंत्र में सवाल उठाना और जवाब मांगना आवश्यक है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो 9 मार्च की तारीख केवल एक प्रस्ताव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता और विपक्ष के बीच शक्ति-संतुलन की परीक्षा भी होगी। यदि प्रस्ताव आता है, तो संख्या बल, दलों की एकजुटता और सार्वजनिक संदेश—तीनों ही अहम होंगे। विपक्ष के लिए यह एकजुटता दिखाने का अवसर है, वहीं सरकार के लिए संसदीय स्थिरता और नियंत्रण साबित करने की चुनौती।

अंततः, यह पूरा घटनाक्रम संसद की कार्यसंस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या टकराव संवाद पर भारी पड़ेगा, या लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर समाधान निकलेगा—यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। देश की निगाहें संसद पर टिकी हैं, क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती केवल बहुमत से नहीं, बल्कि स्वस्थ असहमति और निष्पक्ष संचालन से तय होती है।