प्रदूषण की गिरफ्त में उत्तर भारत: क्या दिल्ली को दोष देकर बच निकल रहे हैं?
उत्तर भारत के आसमान पर छाया धुंध का साया अब केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार के कई हिस्सों में वायु गुणवत्ता लगातार ‘खतरनाक’ स्तर पर बनी हुई है। हर साल सर्दियों की दस्तक के साथ ही हालात बिगड़ते हैं, स्कूल बंद होते हैं, अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है और आम जनजीवन पर सीधा असर पड़ता है।
राजधानी दिल्ली अक्सर इस संकट का केंद्र बनकर उभरती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या की जड़ कहीं और है। पराली जलाना, औद्योगिक उत्सर्जन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, निर्माण गतिविधियां और वाहनों का बढ़ता दबाव—ये सभी मिलकर पूरे उत्तर भारत को एक बड़े ‘गैस चैंबर’ में बदल रहे हैं। इसके बावजूद कार्रवाई का बड़ा हिस्सा दिल्ली तक ही सीमित दिखाई देता है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार हवा की कोई सीमा नहीं होती। एक राज्य में उठता धुआं सैकड़ों किलोमीटर दूर तक असर डालता है। पंजाब और हरियाणा में जली पराली का धुआं दिल्ली-एनसीआर तक पहुंचता है, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान की औद्योगिक गतिविधियां भी प्रदूषण के स्तर को बढ़ाती हैं। ऐसे में केवल एक शहर पर सख्ती करना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।
सरकारी स्तर पर कई कदम उठाए गए हैं—ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP), ऑड-ईवन योजना, निर्माण कार्यों पर रोक और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रतिबंध। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम स्थायी समाधान दे पा रहे हैं या सिर्फ तात्कालिक राहत बनकर रह जाते हैं?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब जरूरत है क्षेत्रीय और समन्वित नीति की। पराली प्रबंधन के लिए किसानों को व्यावहारिक और आर्थिक रूप से टिकाऊ विकल्प, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज़ी से संक्रमण, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना और औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त निगरानी—ये सभी कदम एक साथ लागू करने होंगे।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम प्रदूषण की असली वजहों पर काम कर रहे हैं या केवल उसके असर को नियंत्रित करने में उलझे हुए हैं। जब तक समाधान की तलाश सही दिशा में नहीं होगी, तब तक दिल्ली ही नहीं, पूरा उत्तर भारत इसी तरह हर साल ‘गैस चैंबर’ बनता रहेगा।